वैक्सीन रांची पहुंची!

कोरोना वैक्सीन की पहली खेप पहुंची रांची। #ATVideo #AajSubah #CoronavirusVaccine

           

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।।"राजनीति एक संगठित लूटतंत्र है"।।

मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गयी जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डावाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर—घर, द्वार—द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़े।

एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी— अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज—रोज नयी—नयी जवान—जवान भेड़ें खाने को’ मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, उधर भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ—साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे?

उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने हैं। तो सिंह ने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वोदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले—अकेले मिलता हूं तो कुछ और लेकिन जब सबको मिलता हूं तो सर्वोदयी की बात कर देता हूं।

राजनीति.., क्या सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने--राजनीति! जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा_धड़ी है, बेईमानी है। राजनीति डकैती है.. लूट-खसूट है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए--आउट ऑफ डेट। इसीलिए तो बेचारे डाकू राजनीतिज्ञों के सामने समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार_ इससे तो राजनीति बेहतर।

राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की भांति। "राजनीति" यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर_डाकू मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे_लंबे भाषण करें और फिर अपने_अपने उसी काम_धंधे पर निकल जाएं।
जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े_ मकोड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी_देवताओं_महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं ठीक यही चरित्र राजनेताओं का है।

राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। होश पता नहीं तुम्हें कब आयेगा?

#OshO_NamaN


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