धरना दे रहे किसानों को नहीं पता कानून में समस्या, किसी के कहने पर बैठे: हेमा मालिनी

हेमा मालिनी ने बयान दिया कि धरने पर बैठे किसानों को ये भी नहीं पता है कि उन्हें क्या चाहिए और कृषि कानूनों के साथ असली दिक्कत क्या है. इससे ये साफ होता है कि उन्हें किसी ने कहा और वो लोग धरने पर बैठ गए हैं. #FarmersProtest #HemaMalini

           

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```किसान बिल के नए फार्म (रिफॉर्म) की जड़ क्या है और राजनेता इससे क्यों चिंतित हैं?
इसे सही ढंग से समझने के लिए इस विश्लेषण को पढ़ें.....

नई प्रणाली में, कृषि उपज के व्यापारियों को केंद्रीय प्राधिकरण (Central Agency) के साथ अपना PAN NO. पंजीकृत करना होगा।

प्रथम स्तर का लेनदेन (जो किसान और व्यापारी के बीच होगा) जीएसटी प्रणाली के दायरे से बाहर होगा। यहां तक कोई समस्या नहीं है..

धीरे-धीरे, आगे कृषि व्यापार कर रहे पंजीकृत व्यापारियों को, जीएसटी प्रणाली के दायरे मे लाया जाएगा। नतीजतन, कृषि उपज की बिक्री और पूरी आय सरकार के रिकॉर्ड में मिल जाएगी।

GAME यहाँ से शुरू होगा। किसान तो हमेशा आयकर और जीएसटी प्रणाली से मुक्त रहेंगे, लेकिन जो ट्रेडर्स (पंजीकृत व्यापारी) इन एग्रीकल्चर प्रोडक्ट को आगे अप-स्ट्रीम मे बेचते हैं उन्हे जीएसटी और इनकम टैक्स के दायरे में लाया जाएगा, उन्हे टैक्स का भुगतान करना होगा....

इसे यहाँ आसानी से समझने के लिए एक उदाहरण:
अगर सुप्रिया सुले और पी. चिदंबरम को अपने अंगूर और गोभी को व्यापारियों को क्रमशः 500 करोड़ रुपये में बेचना है, तो उन्हें आयकर से छूट रहेगी, लेकिन उन्हें अपने आईटीआर में जिस व्यापारी को माल बेचा है, उसका PAN NO. बतलाना होगा।

ट्रेडर को अप-स्ट्रीम में माल को बेचकर अपनी आय पर 500 करोड़ रुपये आयकर और जीएसटी का भुगतान करना होगा।

कल्पना कीजिए कि यदि कोई अंगूर और कोई गोभी है ही नहीं (सिर्फ भ्रष्टाचार का पैसा है) तो स्वाभाविक रूप से, माल खरीदने वाला व्यापारी सुप्रिया सुले (शरद पवार की सुपुत्री) या चिदंबरम जैसे लोगों से जीएसटी और आयकर वसूल करेगा! (भाई, वो व्यापारी भला क्यों अपना नुकसान करके माल खरीदेगा,जिस पर उसे GST देना पड़े)
इसलिए, सभी सुले, सभी चिदंबरम, सभी सुखबीर सिंह बादल ,सभी भ्रष्ट नेताओं को, जो कमीशन एजेंट और दलाल हैं, उन्हें अपनी कृषि आय दिखाने के लिए अब एक बड़ी रकम का भुगतान इनकम टैक्स और GST के रूप में भुगतना होगा।

ये रकम करोड़ों में नही बल्कि अरबों में है।

ईमानदार किसान, जिनके पास वास्तव में कृषि उपज होगी, वे इस दायरे से मुक्त रहेंगे।

यही इस मामले कि जड़ है, इसलिए सारे भ्रष्टाचारी बिलबिला रहे हैं, यदि ये बिल लागू हुआ तो उनके भ्रष्टाचार से कमाए ख़ज़ाने में छेद हो जायेगा।

पंजाब और महाराष्ट्र में कृषिगत भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा है, साथ ही राबर्ट वाड्रा के साम्राज्य का बड़ा हिस्सा हरियाणा में है, तो विरोध वहीं से आ रहा है!

यदि कल को अम्बानी या अडानी इन किसानों से माल खरीदते भी हैं तो उन्हें उस खरीद पर सरकार को GST और टैक्स देना होगा जो अब तक टैक्स से बचा हुआ था।

अब आप समझ सकते हैं कि सारे विपक्षी राजनेता आंदोलनकारियों की भीड़ इकट्ठा करने में इतना भारी धन क्यों खर्च कर रहे हैं।

अगर भारत से भ्रष्टाचार को आमूल चूल खत्म करना है, तो इस बिल के पीछे छुपी राष्ट्र_निर्माण की सही मंशा को समझना होगा और इस बिल का समर्थन करना ही होगा।

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यही ️कारण हैं कि तीनों बिल वापसी के अलावा किसानों द्वारा और कोई विकल्प स्वीकार नहीं किया जा रहा और सरकार इनकी वापसी स्वीकार नहीं कर सकती।


मैडम जी आप को सब पता है खेती क्या होती है आपने तो सीधे शब्द में कह दिया किसानों को नहीं पता लेकिन आप लोग तो एक मोदी साहब के नाम अंधे हो अंध भक्त हो उनके मुंह से जो निकलता है आप लोग उसी की पूजा करते हैं आप लोगों के लिए भगवान तो मोदी ही हैं या में राम मंदिर की सलाह देते हो आप लोग और रसोई गैस इतना महंगा हो गया पेट्रोल इतना महंगा हो गया डीजल इतना महंगा हो गया लॉकडाउन में डीजल और पेट्रोल का कच्चे तेल का रेट कितना नीचे था लेकिन फिर भी हिंदुस्तान में डीजल और पेट्रोल का रेट सस्ता नहीं हुआ क्यों आप लोगों को है जवाब कोई अगर किसान गेहूं भेजता है तो ₹14 किलो और फॉर्चून आता आता है रानी साहब का ₹35 किलो क्यों इतना फर्क है आप लोगों के पास है कोई जवाब हटानी ही क्यों देश में और कोई और कोई आदमी नहीं है उसको क्यों कॉन्ट्रैक्ट दिया जा रहा उसके इतने बड़े-बड़े गोदाम क्यों बने हैं 2016 में ही गुलाम बने इसका मतलब है कि आप लोग की प्लानिंग पहले से थी सारा कुछ तो प्राइवेट कर रहे हो आप लोग हिंदुस्तान के पास रहकर आ जाएगा जीडीपी इतने नीचे गई उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा और देश का नौजवान बेकार घूम रहा है उसका भी आप लोगों को ध्यान नहीं है


सरकार बनाना बहुत आसान हो गया है, जो लोग दुनिया पर सवाल खड़ा करते थे कि पुलिस है बीएसएफ है आर्मी है फिर आतंकवादी कैसे घुस आते हैं उन्हीं के सत्ता में रहते पुलवामा हमला हो जाता है ठीक लोकसभा के चुनावों से पहले,और इस हृदय विदारक घटना के होने के बावजूद लोग इस्तीफा देने के बजाए,इसे अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हैं,फिलहाल ये तो पक्का हो चुका है कि जब जब चुनाव होंगे उससे पहले आईबी सीबीआई एक्टिव हो जाएंगी,दंगे की आशंका बढ़ेगी और बॉर्डर पर खतरा होगा,और बुद्धिमान आंख बंद कर वोट डाल आएंगे,प्रश्न करने की जगह,मतलब ये है कि सत्ता के लिए किसी ना किसी की कुर्बानी दी जा सकती है,ये कलयुग नहीं तो क्या है



वैसे इनकी बात में कुछ सच्चाई भीहै, मैंने भी वहां कईयों से, बड़े, बुजुर्ग से बात की सभी बोलते है मेरे नेता जो हैं, उन्हें सब मालूम है हम तो उनको सपोर्ट करने आये है। मोदी गोवेनमेन्ट से अपना हक लेने आये हैं। जब पूछा कोन से हक तो बोले वो तो हमारे बड़े नेता जानते हैं।
वैसे भी इंडिया में कहा सबको कानून की सब बारीकियां मालूम होती है। 90% लोग तो नेताओं के बातों पर ही विश्वास करते हैं अब वो कोई भी नेता हों,
कामगार नेता
किसान नेता
छात्र नेता
वकील नेता
जन नेता
डॉक्टर एसोसिएशन नेता
इंजीनियर एसोसिएशन नेता
एम्पलयोई एसोसिएशन नेता
लेफ्ट नेता
साधू नेता
मौलवी नेता
और बहुत से.....आप और भी जोड़ सकते है


दुनिया का सारा ज्ञान भगवान ने कूट कूट कर हेमामालनी के अंदर ही भर है। हेमा जी तो राजनीति में पीएचडी की रही तभी तो इनको सांसद बनाया गया है। देश की विडंबना और दुर्भाग्य ये है के आम लोगो के वोट से जीत कर विधायक और सांसद बनने वाले लोग अपने आप को बहुत ही योग्य और सर्वगुण संपन्न समझने लगते है जब की असली हकीकत ये है की कोई 10वी पास है तो किसी के डिग्री ही फर्जी है। उनको मिली कुर्सी लोगो के द्वारा दान में दिए गए वोट से मिली है जिसके लिए ये लोग गली गली हाथ जोड़ कर लोगो के पैर पकड़ कर वोटों की भीख मांगें है। भीख में मिली पद और कुर्सी का इतना घमंड करना ठीक नही है।


अगर डॉक्टर ना होता तो क्या इलाज हो पता?? , कपडा बनाने वाले ना होते तो क्या हम अपने तन को ढक पाते?? मज़दूर ना होते तो सर पर छत कहा से लाते??? इंजीनियर ना होते तोक्या जिन्दगी आसन हो पाती ?? टीचर ना होते तो क्या हम एजुकेशन ले पाते ।सब अपना काम करते हैं बदले मे पैसा लेते हैं, अपनी मेहनत के अनुसार ।सब इस देश के लिये उतने ही ज़रुरी है जितना एक किसान ।मै भी किसान की दिल से इज़्ज़त करता हू ।पर ये कहना गलत है की वे अन्नदाता हैं ।एक अध्यापक विद्या देता है जिससे बहुत लोगों का भविष्य बनता है जीवन सुधरता है ,पर मै उसे विद्यदाता नही कहुगा ।वो पैसा लेता है अपना काम करता है ।ठीक उसी तरहा जैसे एक किसान ।शायद मेरी बात बहुत से लोगों को बुरी लफे पर ये एक तार्किक सच्चाई है ।


किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं, यह समझने के लिए #शिमला जाइए!

शिमला मे #सेब के #बाग़ हैं, और किसानो से छोटे-छोटे व्यापारी सेब खरीद कर देश भर मे भेजते थे! व्यापारियों के छोटे छोटे गोदाम थे! #अदाणी की नज़र इस कारोबार पर पड़ी! हिमाचल प्रदेश मे भाजपा की सरकार है तो अदाणी को वहाँ ज़मीन लेने और बाकी कागज़ी कार्रवाई मे कोई दिक्कत नही आई! अदाणी ने वहाँ बड़े बड़े गोदाम बनाए जो व्यापारियों के गोदाम मे हजारों गुना बड़े थे!

अब अदाणी ने सेब खरीदना शुरू किया, छोटे व्यापारी जो सेब किसानो से 20 रूपया किलो के भाव से खरीदते थे, अदाणी ने वो सेब 22 रूपये किलो के भाव से खरीदा! अगले साल अदाणी ने रेट बढ़ा कर 23 रूपये किलो कर दिया! अब छोटे व्यापारी वहाँ खत्म हो गए!
अदाणी से कंपीट करना किसी के बस का नही था!
जब वहाँ अदाणी का एकाधिकार हो गया, तो तीसरे साल अदाणी ने सेब का भाव 6 रूपये किलो कर दिया!

अब छोटा व्यापारी वहाँ बचा नही था, किसान की मजबूरी थी कि वो अदाणी को 6 रूपये किलो मे सेब बेचे!

टेलीकॉम इंडस्ट्री की मिसाल भी आपके सामने है, कांग्रेस की सरकार मे 25 से ज़्यादा सर्विस प्रवाइडर थे, Jio ने फ्री काॅलिंग, फ्री डेटा देकर सबको समाप्त कर दिया! आज केवल तीन सर्विस प्रवाइडर ही बचे हैं, और बाकी दो भी अंतिम साँसे गिन रहे हैं!

कृषि बिल अगर लागू हो गया तो गेहूँ, चावल और दूसरे कृषि उत्पाद का भी यही होगा! पहले दाम घटाकर वो छोटे व्यापारियों को खत्म करेंगे और फिर मनमर्जी रेट पर किसान की उपज खरीदेंगे! जब उपज केवल अदाणी जैसे लोगों के पास सी होगी, तो मार्केट मे मनाॅपली होगी और बेचेंगे भी वो अपने रेट पर!

अब सेब की महंगाई तो आप बर्दाश्त कर सकते हो, क्योंकि उसको खाए बिना आपका काम चल सकता है, लेकिन रोटी और चावल तो हर आदमी को चाहिए!

अभी भी वक्त है जाग जाइए, किसान केवल अपनी नही आपकी भी लड़ाई लड़ रहा है!


कल सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने कहा कि किसान आंदोलन में महिलाएं और बूढ़े लोग क्या कर रहे हैं ?

जज साहब ने कहा कि इन्हें वापिस भेजिए वरना हम आदेश पारित कर देंगे

शुक्र है यह जज साहब आज़ादी की लड़ाई के वक़्त मौजूद नहीं थे वरना ये गांधी को बूढ़ा होने की वजह से आंदोलन से बाहर निकाल देते

जज साहब मानते हैं कि आंदोलन करना या सरकार का विरोध करना औरतों का काम नहीं है

जज साहब भारत के स्वर्णिम अतीत की वापसी करने पर आमादा लगते हैं जिसमें औरतों का काम घर के भीतर रहना और मर्दों की सेवा करना था

वैसे जज साहब को मालूम हो जाना चाहिए कि अगर वे किसान महिलाओं के आंदोलन करने के अधिकार के खिलाफ आदेश पारित कर भी देते तो औरतें उस आदेश को फ़ाड़ कर हवा में उड़ा देती

यह अंबेडकर सावित्री बाई फुले फातिमा शेख गांधी मार्क्स भगत सिंह और सैकड़ों चिंतकों की चेतना से लैस आधुनिक महिलाएं है

जज साहब यह प्राचीन भारत की पुरुषों से दबने वाली औरतें नहीं है

अपनी इज़्ज़त अपने हाथ होती है जज साहब

अब आप की हर बार बेइज्जती हो तो आप बार बार एक एक रुपया मांगते हुए अच्छे नहीं लगते


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