पुलवामा: शहीद तिलक राज के परिवार से किए गए वादे अब तक अधूरे

शहीद के नाम पर जो वादे थे वे आज तक अधूरे, तहसील जवाली के तिलक राज हुए थे शहीद

           

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भारत की आज़ादी के उपलक्ष्य में आरएसएस के मुखपत्र ‘द ऑर्गेनाइजर’ में प्रकाशित संपादकीय में संघ ने भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया था, और यह घोषणा की थी कि ‘‘हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे.’’ 1948 में तिरंगे को कूचलने वाले
वही लोग आज सत्ता के लिए तिरंगा यात्रा निकालकर देशभक्त बनने निकल पडे हैं ।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के रक्षा सेवा और सेना से जुड़ी रिपोर्ट में गंभीर बातें सामने आई हैं.. जवानों को पर्याप्त राशन नहीं मिल रहा है, खाने में जितनी कैलोरी (ऊर्जा) की जरूरत होती है वो भी उन्हें नहीं मिल पा रही है.नवंबर, 2015 से सितंबर, 2016 के बीच जवानों को नए जूते नहीं मिले हैं. स्थिति काफी नाजुक है. सूत्रों के मुताबिक, जवानों को पुराने फेस मास्क, पुराने जैकेट और पुराने स्लीपिंग बैग दिए जा रहे हैं. उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों से वंचित रखा गया है. सप्तम्बर 19 से वेतन भी नहीं दिया गया है।
फिर भी कोई फरियाद करता है तो उसे आर्मी से निकाल दिया जाता है। क्या यही है जवानों का सम्मान? सिर्फ ढोंग है।
पुलवामा आतंकी हमले में शहीद होने वालों में से आगरा के कौशल कुमार रावत भी थे. उनको शहीदों के नाम पर वोट मांगने वालों ने कोई सहायता नहीं कि है। शहीद कौशल कुमार रावत की मां का कहना है कि उन्हें न तो केंद्र सरकार से कोई मदद मिली है न ही कोई सामाजिक संगठन उनके परिवार की मदद के लिए आगे आया.
क्या यही राष्ट्रवाद है? यही शहीदों के प्रति सम्मान है या वोट के लिए ही जरूरत है?


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