चीन की आस्तीन पर बैठा तोता क्यों बन गया नेपाल!

जानिए, भारत को आंखें दिखाने का साहस नेपाल कहां से और क्यों जुटा रहा है. (iChowk से)

           

https://www.facebook.com/aajtak/posts/10160003372507580

आजतक वाले भी धोखा खा गऐ। वली जी भारतके हिमायती रहनुमा हैं।। उनके footsteps को नजरअन्दाज न करें तो, कालापनी सम्झौतेमें भारतके पक्षमें उनकी जद्दो-जहद और आजके पद पर आसिन कोई दोहरी राह नहीं है।। South Block से उनके खुबसुरत ताल्लुकात हैं।। मंचो पर भारतको दो टुक कहके उनकी राजनिती बनती है तो भारतका क्या बिगड जाता है। ये formula भी उनको South Block से ही मिला है।। रहि भारत बिरोधी राष्ट्रियता की बात तो ये युरोपियन यूनियन का schooling है की हिन्दुत्व कि धार से दोनो देश की नजदिकी नबढे की कृश्चिनिटी के प्रचार-प्रसार में आडे न आए।। राष्ट्रियता तो एक फण्डा है बस।।


अरे तुम इंडिया वाले को क्या पता है हम अपना ज़मीन अपना नक्से में रखा तुम्हें फट क्यू रही है चीन को नीच देखाने वाले खुद नीच होते जा रहे हो खुद अपने आप को नीचा देखा रहे हो भारतीय मीडिया वाले वो दिया वो किया अपने स्वार्थ के लेते हुए किया है जब हमारे मुल्क में भूकम्प हुआ था तब भी भारत ने नाकाबंदी कर दीं थी क़ोन सा बड़ा काम किया है तुम लोगों ने हम मेहनती है अपना पसीना का पैसे लेरहे है कोई भिक माँग नहीं रहे है तुम्हारे मुल्क के हज़ारों लोग हमारे नेपाल में भिक मगाने आए हुए है हम सब को इजत दिए है तुम्हारे जैसे बेजती नहीं करते ।


कुनै बेला नेपालमा प्रतिबन्धित गरियेको गित ।
#कालापानी
भारतले यो गित बन्द गराको थियो !

आखिर के भन्न खोजेको छ त यो गीत ले ?
► यो गीत अत्ति नै सान्दर्भिक छ आजको दिनमा । ‘माछी मार्न जाउँ न दाजै कालापानीमा’, खासमा कालापानी हाम्रो भूभाग हो तर १९६२ देखी भारतिय सेनाले कब्जा गरेर बसेको छ ।यो गितको शब्दले भारतिय सेनालाई माछिको विम्व प्रयोग गरेर लखेट्न जाउँ भन्दै स्रोतालाई प्रेरित गर्दछ ।

► ‘आ रैछ घाउ १८ को नालापानीमा ‘ , यसले हाम्रा विर पूर्खाहरूले १८ औँ शताब्दीमा लडेर गरेको सुगौली सन्धिको घाउ अझै छ भन्छ नालापानीमा ।

► त्यसै गरी ‘नेपाली खै कुरो बुझेको मनपरि जनसङ्ख्या बढेको ‘ , जनसङ्ख्याको मत्लब हो बढ्दै गरेको छिमेकको देशबाट Illegally नेपालमा ह्वात्त बढेको जनसङ्ख्या ।यो गितले त १५ वर्ष अघि नै भविष्यवाणी गरेको थियो ।भनिन्छ २००९ साल देखि करिब ८० लाख भारतियहरूले नेपाली नागरिक्ता पाई सके । तेही भएर त आज खुलेआम देश टुक्र्याउन् कुरा गर्छन् त ।

► ‘थुनिदेउ नचाहिने ढोका स्वदेशी हो कम्मरै कस’ ,यसले हाम्रो खुला सिमीलाई बन्द गरौँ भन्छ ।

► विदेशीको नोकरीको भर छैन , फर्केर आउँदा घर छैन ‘ , यसको मत्लव हो विदेशमा नोकरी गरेर घर फर्कँदा छिमेकीले घर कब्जा गरिसक्छ ‘

► ‘पशुपतिनगर, जङ्गेपिलर ‘ , यी हाम्रो सिमाका क्षत्र हुन् जुन् मिचिँदै छन् दिनदिनै ।

► त्यसैले नेपालीहरू सबै जागौँ । पूर्खाले बनाएको देशलाई हामीले रक्षा गर्नु पर्छ । नेपाल रहे मात्र हामी रहन्छौँ ।



Rinku Garhwal well bro i dont get you what you are talking i had seen indian news ajtk chnnel according to them boundry decided by origin of kalinadi limpyudhara bro..and you know i am from kalapani..the people still alive here who separated the border..we have recorded their video..in case you want to see and go their to boundry we can show you the old 19 piller as your border is very new..the lab technician can define it..really bro hadap krri he india mano..mere pas or v vht video he jisme SSB army nepalio se kehri kii..india ki he bolo ye zmene tme Rasan Card voter id pesa sab milega..ye me thoribprani bat krr or v asi videos h jisme ssB jbrdsti hadap karre jo tmtk ni phochi..bro you are ri8 but govmnt has different plan..trust me


https://m.facebook.com/st...mp;d=n&vh=e नेपाल से नमस्ते!
हम आपको नेपाल और भारतके बीच विवादित भूमि के बारे में सूचित करना चाहते हैं जिसमें उत्तर-पश्चिम में भारत के साथ नेपाल का सीमा, लिम्पियाधुरा से लेकर कालापानी तक और दक्षिणी भाग में सुस्ता शम्मिलित हैं।

8 मई, 2020 को, भारत ने चीन तक मानसरोवर के लिए लिपुलेख दर्रे से होकर लिंक रोडका उद्घाटन किया। यह विवाद नवंबर 2019 में भी सतह पर आयाथा जब भारत ने अपने तरफसे भारतके राजनीतिक नक्शेमे उन क्षेत्रों को भी डाल दिया। २०१५ मे जव नेपाल भूकंपके चपेट मे था, उष समय पर चीन और भारत सरकार लिपुलेख दर्रे से होकर व्यापार और तीर्थयात्रा करने के लिए सेहमत हुए। पिछले पांच वर्षों में भारत की ओर से इन कार्यों के जवाब में, नेपाल ने 2015, 2019 और 2020 में भारत सरकार को और 2015 में चीनी सरकार को कुटनीतिक नोट भेजा।

भारतके साथ नेपाल का उत्तर-पश्चिमी सीमा में इस भूमि विवादका मूल कारण तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल सरकार के बीच 1816 का सुगौली संधि है, जो मुखर रुप से लिम्पियाधुरा से निकलती काली नदी को दोनों देशों के बीच का सीमा मानता है। यह नेपाल का दावा है। जबकि भारतका दावा है कि काली नदी लिंपियाधुरा से लगभग 16 किलोमीटर पूरव में है। आज का हाल यह है कि भारत ने 1962 से उस क्षेत्र में 372 वर्ग किलोमीटर और सुस्ता में 145 वर्ग किलोमीटर नेपाली भुमि अतिक्रमण करके अपने कब्जे मे रखा है।

भारत सरकार ने अलग-अलग समय में नेपालद्वारा उठाए गए मुद्दे को नोट किया है और कहा है कि वे सुविधाजनक समय पर बातचीत के लिए बैठेंगे। हालांकि, विदेश सचिव के स्तर पर 2014 में गठित कुटनीतिक वार्ता अवतक सम्भब नही हो पाया है।

हम यह बताना चाहते हैं कि विवादित भुमि सहित नक्शा प्रकाशित करना और वहां एकतरफे रुपमे सड़कें बनाना संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 (4) का उल्लंघन है। हम भारत सरकार से संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करते हुवे कुटनीतिक बातचीत के माध्यम से सीमा विवादों को हल करने केलिए आग्रह करते हैं। और हम इस मुद्दे पर एक स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान ढुन्ढने के लिए इस तरह के बातचित के लिए आपसे समर्थन की अपेक्ष्या करते है ।

धन्यवाद !
#BorderDispute #Nepal #India
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भारत से हमारा नजदिक का सम्बन्ध होते हुय भी भारत का मुन्नाभाई प्रबृत्ति का कारण जटिल अवस्था नेहरु कि प्रधानमन्त्री काल से सुरु हुवा। ब्रिटिश इन्डिया और नेपाल से किया गया सन्धि मे भी नेपाल ने तोप के बल मे दार्जिलिंग कुमाउ गढवाल हिमान्चल तक कि जमिन गवाना पाडा। लेकिन १८१६ कि सुगौली सन्धि को भी भारत पालना नही कर राहा हे। जिस संधि मे काली नदि के उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा से पुरब का भूमाग नेपाल सरकार का होनेका बात हे। अंग्रेज तो भारत छोड के गय,लेकिन अभि का भारत अंग्रेज का भुत सबार कर के गय। भारत चीन युद्द मे कालापानी मे भारतीय फौज तैनात कर दिया गया। नेपाल भारत खुन के सम्बन्ध के तहेत उस समय वैठ तो गय लेकिन छोटे और कमजोर देस को दबदबा बनाके भारत उसी भूभाग को अपने भूभाग बानाने मे लग गय। सरासर ना इन्साफी। भारत से गैर जिम्मेवार और बेइमानी का इतिहास यहि से सुरु होता हे। भारत चहता हे नेपालमे अ स्थिरता हो,गरिबी बने रहे,नेपाली फुटे टुटे रहे,यहाँ का राजनीति खराब हो तो उसका मनसुबा पुरा हो जायगा। यह बात ३/३ बार नाकाबन्धि लगाने,राज शाही को फेकने,माओबादि को बम,बारुद,बन्दुक और तालिम दे कर नेपाल धोस्त बनाने का मिशाल से पता चलता हे। इस बिषय मे रअ के पुर्ब प्रमुख हर्मिज सविस्तार आपनी पुस्तक मे लिख चुके हे। पडोशी का घर मे आग लगे तो अपना घर भी सुरक्षित नही होता, यह बात सभिको समझ मे आना चाहिय। चिन के साथ् सगरमाथा बिबाद १९५५ कि दसक मे हि समाधान हो चुका हे। २/४ जगह सिमा समस्या को बात सुना हे ओह भी इतना जटिल नही हे। गुगल मे माउन्ट एभरेस्ट चिन मे दिखाया गया तो य गुगल कोहि रास्ट्र तो नही हे। कोहि प्रमाणिक युयन का निकाय भी नही हे। दुनिया के सम्बन्ध मे सभी चिज बदल सकते हे,पडोशी अशल हो या खराब नहीं बदल सकते। आखिर मिल के रहना बाध्य हे। नेपाल भारत दोनो देसका जनता चाहते हे कि दोनो देसका सम्बन्ध अटुट रहे। बशुधैब कुटुम्बकम के तहेत चले। सत्यमेब जयते हो। मुझे सोतंत्र नजर से देख कर य लगता हे कि नेपाल चिन के बहकाबे मे आया। य कहेना प्रोपोगान्डा हे। अपनी जमिन को हक जताने मे किशी का कहेना नही पडेगा। लेकिन समय का इन्तजार जरुर करना चाहिय। नेपाल के सभी पार्टी नेता य मानते हे कि भारत नेपाल के जमिन हडप रहा हे और उसको यैसा हर्कत नही करना चाहिय। ओह नेपाल भारत के फरेन सेक्रेटरी लेबल का बार्ता करने भी टाल रहा हे। नेपाल भारत के प्रबुद्द समूह के बनायागया EPJप्रतिबेदन भी सालो से रिजेक्ट कर रहा हे जबकि ओह प्रतिबेदन दोनो देस कि सिमा समस्या समाधान हेतु मिल कर हार्ड वोर्क करके बनाया गया हे। अभि भारत के मेडिया यक तरफा जनताको गुमराह रख कर मेडिया बाजी कर रहे हे। य उसका बाजारु नियत हे। बिबिसी हिन्दि और नेपाली समाचार ज्यादा सोतंत्र और बिस्वसनिय हे। नेपाल भारत दोनो देस मिलकर भारत द्वार बिबाद किया गया समस्या हल करना चाहिय। भारत ब्याक होना चाहिय। बल के जरिय संसार जितना हे तो भारत संसार जिते नही तो मित्रता और छोटे पडोश को भी इज्जेत करना चाहिय। उसका स्वाभिमान छोटा बडा नही हे।हे।JAY HO


https://www.facebook.com/...mp;d=n&vh=e Namaste from Nepal !

We want to inform you about the disputed lands between Nepal and India that includes Limpiyadhura to Kalapani in the north-west of Nepal's border with India & China and Susta in the southern part of Nepal's border with India.

On May 8, 2020, India inaugurated the link road to Mansarovar in China via the Lipulekh pass. The dispute also arose in November 2019 when India unilaterally released a new political map putting those regions in India.

Back in 2015, in the immediate aftermath of a major earthquake in Nepal, China and India agreed to conduct trade and pilgrimage through the Lipulekh pass. In response to these actions from the Indian side in the last five years, Nepal sent a diplomatic note to the Indian government in 2015, 2019 and 2020 and also to the Chinese government in 2015.

The root cause of this land dispute in Nepal's north western border with India dates back to the sugauli treaty of 1816 between the then East India Company and Government of Nepal which states, river Kali, that originates from Limpiyadhura is the border between the two countries. and that has been the position of Nepal while India claims Kali river to be around 16 km east of Limpiyadhura. On this basis, India has been encroaching roughly 372 square kilometers of land in that region since 1962 and 145 square kilometers of Nepali land in Susta.

The government of India has noted the issue raised by Nepal at different times and has said that they would sit in for a dialogue at a convenient time. However, a mechanism formed in 2014 at the foreign secretary’s level has failed to convene till now.

On these grounds, we want to state that India, publishing their maps including disputed territory and building roads unilaterally is in contravention of the article 2 part(4) of the United Nations Charter. We urge India to abide by the UN charter and resolve border disputes via diplomatic dialogue. And we would appreciate your support to such a process to find a permanent peaceful solution on this issue.

Thank you!
#BorderDispute #Nepal #India

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Bharat ko taiwan ki support dena chahiye.abhi china puri duniya me ghira pada hai.yahi samay hai bharat bhi puri jor se china pe prahar kare.china nepal ke dwara bharat par dabaw banana chah reha hai taki wo america,europe or japan ,australia aadi country jo is samay khulkar china ko barbad karne ke liye lag gaye hai ka sath is samay india na de.lekin bharat ko abhi nepal jaise desho pe dhyan na dekar china ke khilaf in deso ka pure takat se sath dena chahiye.agar china kamzor ho gaya to pakistan nepal to aise hi ud jayenge india ke samne.


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