3 टिप्पणियाँ

यही तो कानून है लोक तंत्र का सजायाफ्ता कैदी को भी वी आई पी ट्रीटमेण्ट, वैसे जिस दिन सजा हो गई पुराने पुण्य समाप्त केवल पापों की सजा मिलनी चाहिए। वैसे धऱ्य है सरकार का जो ट्रीटमेण्ट के लिए एम्स लाए। क्या दूसरा कैदी होता उसके साथ ऐसा होता। कायदा यह होना चाहिए छोटा गरीब अनपढ़ चोरी करता है तो कम दोषी पर रक्षक ही भक्षक तो ज्यादा सजा। इतना सब कुछ के बाद भीलालूभक्त राजनीति कर उसे निदौष बेचारा व सरकार को गलत बता २हे हैं न्यायालय को झुठा साबित कर २हे ।लालू जी को द्दोड़ो उनकी नियति पर। आप राजनीति तेजस्वी के साथ करो।

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लालू यादव दरअसल बिहार में 1980 के दशक के आखिर में शुरू हुई एक राजनीतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसे क्रिस्टोफ जैफरले साइलेंट रिवोल्यूशन कहते हैं. यह दलित, पिछड़ी और मध्यवर्ती जातियों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा पैदा होने और उसके हिसाब से राजनीतिक गोलबंदी करने से शुरू हुई और इसकी वजह से कई राज्यों में नई राजनीतिक शक्तियां और नेता सामने आए. लालू प्रसाद ने बिहार में उसी धारा का नेतृत्व किया.

बिहार जैसे पिछड़े और सामंती मूल्यों वाले राज्य में पहली बार कोई नेता सामंतवादियों को उसकी भाषा में जवाब दे रहा था. वे सवर्णों के सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व को भदेस तरीके से चुनौती दे रहे थे.


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बिहार लालू यादव से पहले भी देश का सबसे बीमार, गरीब और अशिक्षित राज्य था. लालू प्रसाद का शासन खत्म होने के लगभग 14 साल बाद भी बिहार सबसे बीमार, गरीब और अशिक्षित राज्य है. इसलिए यह सवाल गैरवाजिब है कि लालू प्रसाद ने बिहार को यूरोप क्यों नहीं बना दिया.

जब हम यह सवाल श्रीकृष्ण सिन्हा, माहामाया प्रसाद सिंह, केदार पांडेय, केबी सहाय, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा, जगन्नाथ मिश्र, नीतीश कुमार जैसे मुख्यमंत्रियों और पिछले 15 साल में ज्यादातर समय वित्त मंत्री रहे सुशील मोदी से नहीं पूछते, तो ये सवाल सिर्फ लालू प्रसाद से कैसे पूछा जा सकता है?


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