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दिल्ली वोटर्स ध्यान रखना,
कांग्रेसी, वृद्धावस्था पेंशन 5000 रूपये करने के लिए कह रहे हैं। कांग्रेसियों ने UPA शासनकाल में जब मकान का ताला तोड़कर मुझे बेघर बनाया, उसका हर्जाना तो आज तक नहीं दिया, लाखों वृद्धों की पेंशन क्या बढ़ायेंगे। वह इतना बुरा दौर था कि 2008 में कांग्रेसियों से दुखी होकर 153 सैनिकों ने suicide आत्महत्या की थी।

ताला तोड़ने वाले की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी तो मकान खाली करने के लिए तैयार थी, लेकिन ठिठुरती सर्दी में धूप का सुख लेने के लिए "जले पर नमक" की तरह कांग्रेसी और सपाई लूटेरों ने बीच में आकर, मेरे बारे में महिला को बताया कि 700 km दुर, other state, यहाँ अकेला, अब पेंशनर, 62 वर्षीय है। तुम्हारा साथ पूरा मौहल्ला देगा, क्योंकि घरों में नाममात्र राशि में बर्तन साफ करती हो। ऊपर से तुम्हारी 17 वर्षीय बेटी, लगा देना MeToo आरोप। Sahu ने मुझे फोन किया, मैंने पूछा, आप कौन? उसने जवाब दिया कि बबीना का भूमाफिया। मैंने महिला से बात कराने के लिए कहा तो उसने बताया कि बर्तन धोने गई है, उसकी पुत्री से बात कर लो। मेरे मकान में अकेली लड़की और साहू। कुछ अनहोनी होने से भले ही साहू जेल में होता, लेकिन media में छपता कि सूबेदार के मकान में ऐसा हुआ। विषम परिस्थितियां होने से मेरा मकान अब महिला के पास है। जिससे मैं बेघर, धूप का सुख नहीं ले पाता।

प्रकृति के निशुल्क उपहार का सुख न तो धनाड्य को लेना आता, नाहीं गरीब को। धनाढ्य का भरपूर प्रयास होता है कि रात्रि में नीले गगन के तले, धरती का प्यार मिले। जबकि होना यह चाहिए कि प्रातः जल्द उठकर कहे, "नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले"। मिले और पले, मिले का अर्थ अकेला ही सारे सुख ले। पले का अर्थ धरती के सभी प्राणियों हेतु सुख-साधन हों।

रात्रि, या तो चोर, उच्चके, शराबी, जुआरी, लुच्चे-लफ्फंगे और भ्रष्टाचारियों के लिए होती है या इन दुष्टों से जनता की रक्षा करनेवालों के लिए ! बाकि को तो दिन भर की थकावट दूर करने हेतु विश्राम करना चाहिए। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त साधू-सन्यासी, योगी, मेहनती, दुध/सब्जी उत्पादक और सूर्य उपासना करने वालों के लिए है।

धनी एक गिलास पानी पीता है तो 10 को प्यासा रखता है। मुझे एक ऐसा अधिकारी मिला, जिसने अर्दली को आदेश दिया कि हर 1/2 घंटे में पानी लाना। उसकी मर्जी, पीये या नहीं। सरकारी नौकर को निजी बना लेते हैं, जिससे अर्दली इस चिंता में पानी नहीं पी पाता कि कहीं आधा घंटा न हो जाये। दिन भर पानी लिये खड़ा रहता है। अधिकारी ने घर में पानी माँगा तो जवाब यही कि, क्या कार्यालय में इतना काम किया है, जो सामने रखा पानी का गिलास नहीं उठा पा रहे या किसी ने हाथ तोड़ दिए।

अग्नि का सुख भी धनी को नहीं लेना आता। शकरकंद, बैंगन और आलू मीठी-मीठी गर्म राख में मूँगफली की तरह भूनकर खाने का सुख अमीर के भाग्य में कहां। इसके लिए या तो भोजन खुद बनाना पड़ेगा या प्रकाश सिंह बादल की तरह ही लिया जा सकता है, जिसने 45 वर्षों से एक ही रसोइया (उपनाम काला) अपने साथ रखा हुआ है। कभी नमक कम-ज्यादा हुआ, तब भी बेहद नम्र होकर ही बता सकते हैं।

पृथ्वी का सुख तो अमीर ले ही नहीं सकता। इसके लिए तो भाई महाबीर बनना पड़ता है। इन्दिरा ने तानाशाह बनकर आपातकाल लागू कर भाई महाबीर को भी जेल में बंदी बनाया। उसी कोठरी के पास कुछ दिन वाजपेयी जी भी बंदी थे। वाजपेयी जी भाई महाबीर के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि 1998 मेंं खुद उनके घर जाकर मध्यप्रदेश के राज्यपाल पद ग्रहण करने का निवेदन किया। राज्यपाल बनने पर भी भाई महाबीर भोजन जमीन पर बैठकर ही करते थे, कुर्सी पर नहीं। ...4/6


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